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Frequently Asked Questions

आयुर्वेद प्राचीन भारतीय चिकित्सा प्रणाली है, जो शरीर, मन और आत्मा के संतुलन पर जोर देती है। यह प्राकृतिक उपचार पद्धतियों पर आधारित है, जिसमें हर्बल उपचार, आहार, योग और जीवनशैली सुधार शामिल हैं। आयुर्वेद तीन दोषों—वात, पित्त और कफ—के संतुलन को बनाए रखने पर केंद्रित है, जिससे संपूर्ण स्वास्थ्य और रोगों की रोकथाम संभव होती है।
आयुर्वेद केवल रोगों के इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण जीवनशैली प्रदान करता है, जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है। यह व्यक्ति की प्रकृति (प्रकृति) के अनुसार व्यक्तिगत उपचार और आहार का सुझाव देता है।
आधुनिक जीवनशैली में भी आयुर्वेद की प्रासंगिकता बढ़ रही है, क्योंकि यह प्राकृतिक और समग्र उपचार प्रदान करता है, जो बिना किसी दुष्प्रभाव के शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखता है।
आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान (एलोपैथी) दोनों का उद्देश्य स्वास्थ्य को बनाए रखना और रोगों का उपचार करना है, लेकिन इनकी पद्धतियाँ और दृष्टिकोण अलग-अलग हैं।

1. उपचार का दृष्टिकोण
आयुर्वेद: यह रोगों के मूल कारण को समझकर उसका प्राकृतिक तरीके से उपचार करता है। यह शरीर, मन और आत्मा के संतुलन पर जोर देता है और व्यक्ति की प्रकृति (प्रकृति) के अनुसार उपचार प्रदान करता है।
आधुनिक चिकित्सा (एलोपैथी): यह मुख्य रूप से लक्षणों को दबाने और त्वरित राहत देने पर केंद्रित होती है। इसमें दवाइयों, सर्जरी और तकनीकी उपचारों का उपयोग किया जाता है।
2. दवाइयों का आधार
आयुर्वेद: आयुर्वेदिक औषधियाँ प्राकृतिक जड़ी-बूटियों, खनिजों और जैविक तत्वों से बनी होती हैं, जिनका उपयोग हजारों वर्षों से किया जा रहा है।
एलोपैथी: इसमें सिंथेटिक (रासायनिक) दवाइयाँ होती हैं, जो वैज्ञानिक शोध और परीक्षणों के आधार पर विकसित की जाती हैं।
3. साइड इफेक्ट्स और सुरक्षा
आयुर्वेद: चूंकि आयुर्वेदिक दवाएँ प्राकृतिक तत्वों से बनी होती हैं, इसलिए आमतौर पर इनके दुष्प्रभाव (Side Effects) कम होते हैं, यदि सही तरीके से और उचित मात्रा में ली जाएँ।
एलोपैथी: एलोपैथिक दवाइयाँ प्रभावी होती हैं, लेकिन इनके साइड इफेक्ट्स भी हो सकते हैं, जैसे एलर्जी, पेट की समस्याएँ या अन्य दुष्प्रभाव।
4. रोगों की रोकथाम बनाम उपचार
आयुर्वेद: यह केवल रोगों के इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली, संतुलित आहार, योग और ध्यान के माध्यम से रोगों की रोकथाम पर भी ध्यान देता है।
एलोपैथी: यह मुख्य रूप से रोगों के उपचार पर केंद्रित होती है और रोकथाम के लिए टीकाकरण, एंटीबायोटिक्स और अन्य दवाओं का उपयोग करती है।
5. उपचार की अवधि
आयुर्वेद: यह धीरे-धीरे कार्य करता है और शरीर को जड़ से ठीक करने में मदद करता है, इसलिए इसमें अधिक समय लग सकता है।
एलोपैथी: यह त्वरित राहत देती है और लक्षणों को जल्दी ठीक करने में मदद करती है।
6. व्यक्तिगत उपचार
आयुर्वेद: प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति (वात, पित्त, कफ) के अनुसार उपचार दिया जाता है।
एलोपैथी: यह एक ही प्रकार की दवाइयाँ सभी मरीजों के लिए निर्धारित करती है।
निष्कर्ष
आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान, दोनों की अपनी विशेषताएँ और लाभ हैं। आयुर्वेद दीर्घकालिक स्वास्थ्य और समग्र उपचार प्रदान करता है, जबकि एलोपैथी त्वरित राहत और आपातकालीन स्थितियों में अधिक प्रभावी होती है। आजकल, कई लोग दोनों पद्धतियों को मिलाकर एक समग्र और संतुलित स्वास्थ्य दृष्टिकोण अपनाने लगे हैं।

आयुर्वेदिक दवाओं को प्राकृतिक जड़ी-बूटियों, खनिजों और जैविक तत्वों के संयोजन से तैयार किया जाता है। इन्हें प्राचीन ग्रंथों में वर्णित पारंपरिक विधियों के अनुसार निर्मित किया जाता है, जिससे इनके औषधीय गुण सुरक्षित रहते हैं और शरीर पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

1. जड़ी-बूटियों और अन्य प्राकृतिक सामग्रियों का संग्रह
आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण की प्रक्रिया जड़ी-बूटियों, पौधों की जड़ों, पत्तियों, फूलों, फलों, बीजों, खनिजों और धातुओं के संग्रह से शुरू होती है। इन सामग्रियों का चयन उनके औषधीय गुणों के आधार पर किया जाता है।

2. शुद्धिकरण (संशोधन प्रक्रिया)
कुछ खनिजों और धातुओं को आयुर्वेदिक औषधियों में उपयोग करने से पहले शुद्ध किया जाता है। इसे संशोधन प्रक्रिया कहा जाता है, जिसमें विभिन्न प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग करके विषैले तत्वों को हटाया जाता है। उदाहरण के लिए, भस्म (आयुर्वेदिक धातु चूर्ण) बनाने से पहले सोना, चांदी, तांबा, पारा आदि को विशेष विधियों से शुद्ध किया जाता है।

3. दवाओं के निर्माण की विधियाँ
आयुर्वेदिक दवाओं को विभिन्न रूपों में तैयार किया जाता है, जिनमें प्रमुख हैं:

(i) काढ़ा (क्वाथ या कषाय)
(ii) चूर्ण (पाउडर)
(iii) भस्म (आयुर्वेदिक धातु चूर्ण)
(iv) आसव और अरिष्ट (फर्मेंटेड लिक्विड)
(v) तेल (आयुर्वेदिक औषधीय तेल)
(vi) गोली और वटी (टैबलेट फॉर्म)
4. भंडारण और परिरक्षण (Storage & Preservation)
दवाओं को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए इन्हें प्राकृतिक तरीकों से संरक्षित किया जाता है।
औषधियों को सूखी, ठंडी और अंधेरी जगह पर रखा जाता है ताकि उनके गुण नष्ट न हों।
5. गुणवत्ता परीक्षण (Quality Testing)
आयुर्वेदिक दवाओं की शुद्धता और प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए इन्हें पारंपरिक और वैज्ञानिक परीक्षणों से गुजरना पड़ता है। आधुनिक आयुर्वेदिक कंपनियाँ (जैसे पतंजलि, बैद्यनाथ, डाबर) भी गुणवत्ता मानकों का पालन करते हुए परीक्षण करती हैं।

निष्कर्ष
आयुर्वेदिक दवाओं को प्राकृतिक सामग्री, पारंपरिक विधियों और वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर तैयार किया जाता है। यह दवाएँ रोगों के मूल कारण को ठीक करने और शरीर को संतुलित रखने में मदद करती हैं। इनका उपयोग सही मात्रा और सही विधि से करने पर यह सुरक्षित और प्रभावी होती हैं।

आयुर्वेदिक दवाएँ प्राकृतिक जड़ी-बूटियों, खनिजों और जैविक तत्वों से बनाई जाती हैं, इसलिए इन्हें आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है। सही तरीके और उचित मात्रा में सेवन करने पर इनके दुष्प्रभाव (Side Effects) बहुत कम होते हैं। हालांकि, यदि इन्हें गलत तरीके से, अधिक मात्रा में, या बिना योग्य चिकित्सक की सलाह के लिया जाए, तो कुछ संभावित साइड इफेक्ट हो सकते हैं।

1. गलत मात्रा (Overdose) से होने वाले साइड इफेक्ट
आयुर्वेदिक दवाओं का अत्यधिक सेवन शरीर में असंतुलन पैदा कर सकता है।
कुछ जड़ी-बूटियों का अधिक मात्रा में उपयोग पाचन समस्याएँ, गैस, अपच, दस्त या उल्टी का कारण बन सकता है।
उदाहरण: त्रिफला का अधिक सेवन डायरिया (Diarrhea) या डिहाइड्रेशन (Dehydration) का कारण बन सकता है।

2. मिलावटी और घटिया गुणवत्ता की दवाएँ
यदि आयुर्वेदिक दवाएँ प्रमाणित कंपनियों से न लेकर बिना प्रमाणित स्रोतों से खरीदी जाएँ, तो इनमें अशुद्धियाँ या हानिकारक तत्व हो सकते हैं।
कुछ घटिया गुणवत्ता वाली दवाओं में स्टेरॉयड (Steroids) या अन्य रासायनिक तत्व मिलाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं।
समाधान: हमेशा आयुर्वेदिक दवाएँ किसी प्रमाणित ब्रांड (जैसे पतंजलि, डाबर, बैद्यनाथ, हिमालय) या प्रशिक्षित वैद्य से प्राप्त करें।

कैसे बचें?
✔ हमेशा प्रमाणित और उच्च गुणवत्ता वाली आयुर्वेदिक दवाएँ खरीदें।
✔ योग्य वैद्य या आयुर्वेदिक विशेषज्ञ की सलाह से ही दवाएँ लें।
✔ दवा की मात्रा (Dosage) का सही तरीके से पालन करें और ओवरडोज़ न करें।
✔ यदि किसी दवा से एलर्जी या असामान्य प्रभाव महसूस हो, तो तुरंत सेवन बंद करें और डॉक्टर से सलाह लें।
✔ एलोपैथिक दवाओं के साथ लेने से पहले डॉक्टर या वैद्य से परामर्श करें।

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Ayurvedic products can usually be taken alongside allopathic medicine, but it’s always best to consult a healthcare professional before combining treatments.

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